मिरे घर में न होगी रौशनी क्या

नहीं आओगे इस जानिब कभी क्या

चहकती बोलती आँखों में चुप्पी
उन्हें चुभने लगी मेरी कमी क्या

ख़ुद उस का रंग पीछा कर रहे हैं
कहीं देखी है ऐसी सादगी क्या

लिपटती हैं मिरे पैरों से लहरें
मुझे पहचानती है ये नदी क्या

मैं इस शब से तो उकताया हुआ हूँ
सहर दे पाएगी कुछ ताज़गी क्या

तिरी आहट की धूप आती नहीं है
समा'अत भी मिरी कुम्हला गई क्या

ख़मोशी बर्फ़ सी 'आतिश' जमी थी
नज़र की आँच से वो गल गई क्या

— Swapnil Tiwari

More by Swapnil Tiwari

Other ghazal from the same pen

See all from Swapnil Tiwari →

Aankhein Shayari

Shers of aankhein.

All Aankhein Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling