देखिए अहल-ए-मोहब्बत हमें क्या देते हैं

कूचा-ए-यार में हम कब से सदा देते हैं

रोज़ ख़ुशबू तिरी लाते हैं सबा के झोंके
अहल-ए-गुलशन मिरी वहशत को हवा देते हैं

मंज़िल-ए-शम्अ तक आसान रसाई हो जाए
इस लिए ख़ाक पतंगों की उड़ा देते हैं

सू-ए-सहरा भी ज़रा अहल-ए-ख़िरद हो आओ
कुछ बहारों का पता आबला-पा देते हैं

मुझ को अहबाब के अल्ताफ़-ओ-करम ने मारा
लोग अब ज़हर के बदले भी दवा देते हैं

साथ चलता है कोई और भी सू-ए-मंज़िल
मुझ को धोका मिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा देते हैं

ज़िंदगी मर्ग-ए-मुसलसल है मगर ऐ 'ताबिश'
हाए वो लोग जो जीने की दुआ देते हैं

— Tabish Dehlvi

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Ibaadat Shayari

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