मैं तेरी आँख में रह कर हिजाब हो जाऊँ
तू हर्फ़ हर्फ़ पढ़े वो किताब हो जाऊँ
मिरे सिवा कभी तुझ को लुभा सके न कोई
मैं तेरे वास्ते वो इंतिख़ाब हो जाऊँ
तू आसमान की वुसअ'त में ले के जाए मुझे
मैं तुझ पे फ़ख़्र करूँ आफ़्ताब हो जाऊँ
तू बूँद बूँद से लज़्ज़त कशीद करता रहे
मगर न प्यास बुझे वो शराब हो जाऊँ
वो अपनी नर्म सी पोरों से गर छुए मुझ को
महक महक उठूँ मिस्ल-ए-गुलाब हो जाऊँ
तुम्हारी याद में छोड़ूँ न मय-कशी 'ताहिर'
मुझे है जितना भी होना ख़राब हो जाऊँ
— Tahir Hanfi















