इसी गुमान में शब भर मकाँ बदलते हैंज़मीं बदलती है तो आसमाँ बदलते हैंइसीलिए तो तेरे दर पे गिर गया था मैंमैं जानता था मुक़द्दर यहाँ बदलते हैंतेरी निगाह से क़ौस-ए-क़ज़ा निकलती हैवगरना दश्त के मंज़र कहाँ बदलते हैंवो जब यहाँ था तो हम देखते न थे उस कोवो जा रहा है तो हम खिड़कियाँ बदलते हैं— Tajammul Kazmi