अब के बरस ये रंज उठाना पड़ा मुझे
तुझ से मिले बग़ैर ही जाना पड़ा मुझे
शहर-ए-गुमाँ में हसरत-ए-ता'बीर के लिए
हर इक को अपना ख़्वाब सुनाना पड़ा मुझे
पड़ने लगा था एक ख़लल सा उड़ान में
रस्ते से आसमान हटना पड़ा मुझे
मैं ने भी फ़त्ह कर के दिखाया वो शहर-ए-हुस्न
हर चंद रास्ते में ज़माना पड़ा मुझे
मैं ने ही रौशनी का बताया था और फिर
पहला दिया जला के दिखाना पड़ा मुझे
आगे निकल चुका था बहुत आसमान से
तेरी सदा पे लौट के आना पड़ा मुझे
शब की ये शर्त थी कि दिया तक न साथ हो
जलता हुआ चराग़ बुझाना पड़ा मुझे
'तारिक़ नईम' यूँ ही सँवरने के शौक़ में
ख़ुद को नए सिरे से बनाना पड़ा मुझे
— Tariq Naeem















