ऐसी तक़्सीम की सूरत निकल आई घर में

धूप ने हिज्र की दीवार उठाई घर में

सैल ऐसा था कि सब शहर-ए-बदन डूब गया
रात बारिश ने अजब बज़्म सजाई घर में

मुंतज़िर कितने रहे बंद दरीचे सारे
तेरी आवाज़ न फिर लौट के आई घर में

दर-ओ-दीवार महकने लगे अंदाज़ों से
मैं ने तस्वीर तेरी जूँ ही लगाई घर में

यूँ ही इक रात उसे दिल से निकाला क्या था
फिर मुझे रास कोई रात न आई घर में

— Tariq Naeem

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