मेरी आवाज़ पहुँची है कहाँ तक
मुझे लगता है शायद ला मकाँ तक
मुझे दीवानगी तुझ पर यक़ीं है
मुझे ले चल मक़ाम ए जावेदां तक
अभी तो दिल ही बस कु़र्बां हुआ है
लगानी इश्क़ में पढ़ती है जाँ तक
इशारे कुछ मेरे तुम भी तो समझो
बयाँ आख़िर करूँं मैं भी कहाँ तक
— Tariq Faiz















