ख़्वाबों को आँखों से मिन्हा करती है
नींद हमेशा मुझ सेे धोखा करती है
उस लड़की से बस अब इतना रिश्ता है
मिल जाए तो बात वगैरा करती है
आवाजों का हब्स अगर बढ़ जाता है
ख़ामोशी मुझ में दरवाज़ा करती है
बारिश मेरे रब की ऐसी नियमत है
रोने में आसानी पैदा करती है
सच पूछो तो हाफ़ी ये तन्हाई भी
जीने का सामान मुहय्या करती है
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