रात को दीप की लो कम नहीं रखी जाती
धुंध में रौशनी मध्यम नहीं रखी जाती
कैसे दरिया की हिफाजत तेरे जिम्में ठहराऊ
तुझ से इक आँख अगर नम नहीं रखी जाती
इस लिए छोड़कर जाने लगे सब चारागरा
ज़ख़्म से इज्जते मरहम नहीं रखी जाति
ऐसे कैसे मैं तुझे चाहने लग जाऊँ भला
घर की बुनियाद तो यकदम नहीं रखी जाती
— Tehzeeb Hafi















