RAAHI
RAAHI
Ghazal

ये दूरी जो है हम-नशीं ख़ूब-सूरत नहीं है,

मिरा एक-तरफ़ा रहा इश्क़ ज़िल्लत नहीं है

हमें एक आवाज़ तो देते जाने के पहले,
या आवाज़ दे कर के जाने की आदत नहीं है

कभी सोचना यार तुम भी ख़मोशी को मेरी,
ग़लत; कौन बोला, तुम्हारी ज़रूरत नहीं है

सुना है मुझे शहर भर करते बदनाम हो तुम,
मगर हाँ, हमें तुम से कोई शिकायत नहीं है

बता दो ज़रा इश्क़ कैसी दुआ से मिलेगी,
बिना नाम उन के मिरी कोई आयत नहीं है

नहीं रो सका था बिछड़ने समय मह-जबीं से,
नज़र में, मिरे अश्क की कोई क़ीमत नहीं है

बदल है गई, वक़्त के साथ दस्तूर दुनिया,
बदलना तो 'राही' कि यारों रिवायत नहीं है

— RAAHI

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