RAAHI
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Ghazal

दुआ है तुम को भी मुझ सेे मुहब्बत हो

तवक़्क़ो है विसाले यार क़िस्मत हो

मुझे नइँ चाहिए इक अजनबी का साथ
किसी और से मुहब्बत, मुझ पे लानत हो

कई लड़की से हो के, है ये दिल गुज़रा
मेरी तो तुम ही चाहत हो, ज़रूरत हो

मुझे भी जौन के जैसी तमन्ना है
तुम्हें बाकी़ हर इक शाइ'र से वहशत हो

नज़रबंद आदमी भी देख लेगा ये
मेरी जाँ तुम परी सी ख़ूब-सूरत हो

शब-ए-ग़म हो मुबारक क़ैस जैसों को
हमारे पास तुम जो हो, अमानत हो

क़यामत बा'द भी ज़िंदा रहोगी तुम
तुम आख़िर एक शाइ'र की मोहब्बत हो

— RAAHI

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