दिल बहलता ही नहीं अब शाइरी से
मैं बहुत उकता चुका हूँ ज़िंदगी से
मौत ही गर आख़िरी मंज़िल है मेरी
क्या मिलेगा भाग कर फिर बेबसी से
दिल फ़रेब-ए-इश्क़ में मारा गया और
ज़ेहन लड़ता रह गया अफ़सुर्दगी से
बा'द उस के मैं ने समझौते किए बस
इश्क़ तो होता नहीं मुझ को किसी से
पीठ में ख़ंजर मिरे अपनों ने घोंपे
क्या मिला मुझ को मिरी दरिया-दिली से
— ABhishek Parashar















