इक कहानी से कई क़िस्से निकल आए
मेरी आँखें मर गईं सपने निकल आए
जब अचानक याद आई उस की सूरत
ज़ेहन से बीते हुए लम्हे निकल आए
ज़ेहन की अलमारी को खोला गया जब
दिल के कुछ टूटे हुए टुकड़े निकल आए
कारोबार-ए-ज़िंदगी में लग गए दोस्त
जब ग़म-ए-हिज्राँ से हम बच के निकल आए
हाथ मलती रह गई ये दुनिया और हम
आसमाँ को एक दिन छू के निकल आए
ग़म शिकस्त-ए-फ़ाश का है ही नहीं दोस्त
साथ दुश्मन के मेरे अपने निकल आए
— ABhishek Parashar















