दिल की सुन कर दिल के ही साँचे में ढलता है काग़ज़
जब भी उतारूँ उस पे कोई शे'र मचलता है काग़ज़
एक ग़ज़ल में ज़िक्र तेरा इस कारण ही कम करता हूँ
एक जगह पड़ जाए सारी धूप तो जलता है काग़ज़
कहाँ से पढ़ता है ग़ज़लें अपनी वो शाइ'र क्या मालूम
हम जब जाँच करें हर बार ही ख़ाली निकलता है काग़ज़
उस से बहस तभी करना जब हों मज़बूत दलीलें सब
उस की कचहरी में पक्का हो तो ही चलता है काग़ज़
मेरी राय में इतनी मयख़्वारी भी ठीक नहीं फ़ानी
गीला हो जाए जो ज़ियादा तो फिर गलता है काग़ज़
— Ananth Faani















