आँखें ऐसे चल रही हैं साथ में सपने लिए
जैसे दो बच्चे हों निकले स्कूल को बस्ते लिए
एक दिन में ही मैं पूरी उम्र जी जाता हूँ एक
तीन सौ पैंसठ तो इक मुद्दत ही है मेरे लिए
तेरे वाले का तो भाई तू ही जाने है कहाँ
गुमशुदा है मेरा रब कब से मेरे सजदे लिए
चाय वाले वक़्त को सारे झपट्टों से बचा
चाय वाले वक़्त को तो रख ज़रा अपने लिए
यार 'फ़ानी' ज्ञान देने में तो तुम उस्ताद हो
क्यूँ नहीं इस काम के तुम ने कभी पैसे लिए
— Ananth Faani















