शा'इरी उस की काफ़ी प्यारी है
उस से अच्छी मगर हमारी है
लफ़्ज़ वाजिब नहीं भी है तो क्या
उस का वो हम्म लुग़त पे भारी है
चलो अपनी तो उस को ही होगी
उस की किस को जवाब-दारी है
इश्क़ हो जाए या किया जाए
यार इसी में तो बात सारी है
एक ही शे'र मैं कहूँगा बस
ये उसी की तो मश्क़ जारी है
आप मज़दूर हैं यहाँ 'फ़ानी'
'जौन' ही की ज़मीनदारी है
— Ananth Faani















