“जलता जंगल”
कभी लेटे हुए
आकाश में तारे दिखे हों गर बहुत सारे
तो क्या ऐसा लगा है तुम को जैसे कोई जंगल हो
लगी हो आग जिस
में और सारे पेड़ जलते हों
कि जैसे कहकशाँ का कहकशाँ जलता हुआ वन हो
चमकते टिमटिमाते नुक़्ते हों जितने फ़लक में वो
न हों तारे
वो हों उन जलते पेड़ों की सुलगती शाख़ों की नोकें
और इस मंज़र को तुम ऊपर से केवल देख सकते हो
तुम्हें लटका दिया हो जैसे इस जलते हुए जंगल के ऊपर
क्या
कभी ऐसा नहीं सोचा
समझ सकता हूँ
इतने तारे दिखते ही कहाँ हैं शहर में
और इतनी वहशत भी कहाँ तुम में
— Ananth Faani














