दर्द-ए-इश्क़ में हर इक शख़्स मुब्तला होगा
इश्क़ का भरम सर से जब कभी हवा होगा
महज़ एक रिश्ता उस से नहीं रखा मैं ने
सच कहूँ मैं मर जाऊँगा वो जब जुदा होगा
तुम तबीब हो दिल के और मैं मरीज़ ए इश्क़
ख़र्च तुम बताओ कितना इलाज का होगा
चाहते हैं जिस शिद्दत से मिरा बुरा हो आप
गर नहीं भी होना होगा तो भी बुरा होगा
वैसे ख़ूब अच्छा पहले पहल लगा था मैं
बा'द में मगर उस का दिल बदल गया होगा
रोज़ लग रहा है कोई ना कोई प्यारा अब
लग रहा है यूँ मुझ को इश्क़ बारहा होगा
जिस जगह जहाँ पर हम आज है हमारे बा'द
हम अगर नहीं भी तो कोई दूसरा होगा
— Aakash Giri















