मिरे लिए कभी खिड़की नहीं खुली समझो
नहीं था 'इश्क़ उसे मुझ सेे बस यही समझो
हसीन लोग कहेंगे तो सच कहेंगे फिर
जो दिन को रात कहें गर तो रात ही समझो
मैं इतना भी तो समझदार हो नहीं पाया
के काट दूंगा बिना तेरे ज़िन्दगी समझो
ज़रा सा दूर हटो सामने से हट जाओ
कि सीधे पड़ती है आँखों में रौशनी समझो
तमाम 'उम्र तुम्हारे बिना निकालेंगे
निकाल लेंगे घड़े से कोई नदी समझो
कोई चराग़ बुझा देता है मिरे घर का
भला कहाँ से हो पाएगी रौशनी समझो
मैं ऐसा ही हूँ बदल भी नहीं सका ख़ुद को
इसे दिखावा या तुम मेरी सादगी समझो
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