mire li.e kabhi khidki nahin khulii samjho | मिरे लिए कभी खिड़की नहीं खुली समझो

  - Aakash Giri

मिरे लिए कभी खिड़की नहीं खुली समझो
नहीं था 'इश्क़ उसे मुझ सेे बस यही समझो

हसीन लोग कहेंगे तो सच कहेंगे फिर
जो दिन को रात कहें गर तो रात ही समझो

मैं इतना भी तो समझदार हो नहीं पाया
के काट दूंगा बिना तेरे ज़िन्दगी समझो

ज़रा सा दूर हटो सामने से हट जाओ
कि सीधे पड़ती है आँखों में रौशनी समझो

तमाम 'उम्र तुम्हारे बिना निकालेंगे
निकाल लेंगे घड़े से कोई नदी समझो

कोई चराग़ बुझा देता है मिरे घर का
भला कहाँ से हो पाएगी रौशनी समझो

मैं ऐसा ही हूँ बदल भी नहीं सका ख़ुद को
इसे दिखावा या तुम मेरी सादगी समझो

  - Aakash Giri

Ishq Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Aakash Giri

As you were reading Shayari by Aakash Giri

Similar Writers

our suggestion based on Aakash Giri

Similar Moods

As you were reading Ishq Shayari Shayari