करता नहीं है कोई भी हिम्मत तेरे सिवा
मुझ सेे करेगा कौन मुहब्बत तेरे सिवा
मैं इसलिए किसी की तरफ़ देखता नहीं
मेरे लिए हराम है औरत तेरे सिवा
वो हाल मैंने दिल का किया है कि फिर कोई
कर ही नहीं सका है हुकूमत तेरे सिवा
हर चीज़ है पसंद बनाया ख़ुदा का पर
मुझको नहीं पसंद है सूरत तेरे सिवा
आती नहीं है रास किसी से भी दोस्ती
कुछ शायरों से मेरी है सोहबत तेरे सिवा
तय हारना है मेरा मुक़दमा भी गर करूँँ
आती यहाँ किसे है वकालत तेरे सिवा
रहने कभी भी आया दुबारा नहीं कोई
दिल की हुई तबाह इमारत तेरे सिवा
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