करता नहीं है कोई भी हिम्मत तेरे सिवा
मुझ से करेगा कौन मुहब्बत तेरे सिवा
मैं इस लिए किसी की तरफ़ देखता नहीं
मेरे लिए हराम है औरत तेरे सिवा
वो हाल मैं ने दिल का किया है कि फिर कोई
कर ही नहीं सका है हुकूमत तेरे सिवा
हर चीज़ है पसंद बनाया ख़ुदा का पर
मुझ को नहीं पसंद है सूरत तेरे सिवा
आती नहीं है रास किसी से भी दोस्ती
कुछ शाइरों से मेरी है सोहबत तेरे सिवा
तय हारना है मेरा मुक़दमा भी गर करूँ
आती यहाँ किसे है वकालत तेरे सिवा
रहने कभी भी आया दुबारा नहीं कोई
दिल की हुई तबाह इमारत तेरे सिवा
— Aakash Giri















