'अजब सितम है कि ज़ख़्म देकर मुझे वो मुझ सेे ये बोलता है
ये किस तरह के निशान हैं तुमने हाल अपना ये क्या किया है
कोई तो ग़म है जो एक अर्से से चांद को भी सता रहा है
वगर्ना यूँँ बेवजह भला रात भर यहाँ कौन जागता है
कोई तो था जो निकल के मुझ से तेरी तरफ़ शौक़ से बढ़ा था
कोई ख़बर है कि कौन था वो जो एक मुद्दत से लापता है
तुम्हारे जाने के बाद अब कुछ निज़ाम ऐसा है इस जहाँ का
के रुत बदलती है फूल खिलते हैं पर हर इक रंग उड़ चुका है
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