किसी की याद अब दिल को अज़िय्यत लग रही है
उसे अब भूल जाना इक ज़रूरत लग रही है
निकल कर मैं किसी के दिल से ख़ुद में लौट आया
मुझे इस बे-सुकूँ घर में ही राहत लग रही है
कहानी उसकी झूठी थी मगर उसने न जाने
सुनाई किस अदास के हकीक़त लग रही है
मुझे मिलने तू आया और घटाएं छा गईं हैं
मुझे मौसम की ये कोई शरारत लग रही हैं
तुम उसकी बात पर हामी भरा करते हो हर दम
मोहब्बत कम हमें तो ये हुकूमत लग रही है
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