है चहरे अदाओं का श्रृंगार आँखें
हया से झुके तो हैं इज़हार आँखें
लबों से कही बात का क्या असर है
दिलों से दिलों की हैं गुफ़्तार आँखें
किसी और की हैं तो मय-ख़्वार होंगी
तिरी हैं अगर तो हैं ख़ुम्मार आँखें
शहर छोड़ कर के तू जब से गया है
तेरी राह तकती हैं बेदार आँखें
तू मुझ में समाया है कुछ इस तरह से
तुझे मुझ में ढूंढ़े हैं दो-चार आँखें
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