ek muddat se 'ajab raat yahaañ taari hai | एक मुद्दत से 'अजब रात यहाँ तारी है

  - Haider Khan

एक मुद्दत से 'अजब रात यहाँ तारी है
शहर जलते हैं मगर नींद हमें प्यारी है

धूप को छाँव बताती है ज़मीं को जन्नत
लग रहा है कि ज़बाँ आप की सरकारी है

शोर-ए-बुलबुल है गुलिस्ताँ में बहारों का है रंग
ये ख़बर है तो मगर दावा ये अख़बारी है

आप की जान का सौदा भी वो कर सकता है
हाकिम-ए-वक़्त अगर आपका ब्योपारी है

बे-दिली से ही सही हँस के निभाते हैं सभी
रिश्तेदारी है जो दरअस्ल अदाकारी है

जिस्म इक घर है जो बाहरस भरा दिखता है
और अंदर है जो बस दर्द की अलमारी है

करनी पड़ती है कमी अपनी ही रफ़्तार में कुछ
साथ चलने में किसी के यही दुश्वारी है

एक इक चेहरा तहम्मुल से पढ़ा है उनका
इम्तिहाँ ले लें वो पूरी मिरी तय्यारी है

  - Haider Khan

Shehar Shayari

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