अजीब शर्त रखी है ये आशिक़ी के लिए
मिटा दो ख़ुद को किसी शख़्स की ख़ुशी के लिए
इन्हीं से चलता है अब कारोबार साँसों का
अधूरे ख़्वाब ज़रूरी हैं ज़िंदगी के लिए
नया है मुल्क यहाँ अब हुनर नहीं चलता
यहाँ पे ऐब तक़ाज़ा है हाकिमी के लिए
मिरे ग़नीम का शजरा पता करो पहले
क़रीबी रिश्ता भी लाज़िम है दुश्मनी के लिए
फ़क़त क़लम को चलाने से कुछ नहीं होता
ग़म-ए-हयात भी है शर्त शाइरी के लिए
मुझे ये बात समझने में कितनी देर लगी
मिरा वजूद तो बस खेल था किसी के लिए
हलफ़ उठाया था ज़ख़्मों की ला-ज़वाली का
सो कह रहे हैं ग़ज़ल आज तक किसी के लिए
टपक रहा है ज़मीं पर जो ये लहू मेरा
मिरी तरफ़ से है तोहफ़ा तिरी गली के लिए
कभी किसी ने तिरे ग़म नहीं सुने साक़ी
तिरा ये ग़म तो मुनासिब है मय-कशी के लिए
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