ajeeb shart rakhi hai ye aashiqi ke li.e | अजीब शर्त रखी है ये आशिक़ी के लिए

  - Haider Khan

अजीब शर्त रखी है ये आशिक़ी के लिए
मिटा दो ख़ुद को किसी शख़्स की ख़ुशी के लिए

इन्हीं से चलता है अब कारोबार साँसों का
अधूरे ख़्वाब ज़रूरी हैं ज़िंदगी के लिए

नया है मुल्क यहाँ अब हुनर नहीं चलता
यहाँ पे ऐब तक़ाज़ा है हाकिमी के लिए

मिरे ग़नीम का शजरा पता करो पहले
क़रीबी रिश्ता भी लाज़िम है दुश्मनी के लिए

फ़क़त क़लम को चलाने से कुछ नहीं होता
ग़म-ए-हयात भी है शर्त शाइरी के लिए

मुझे ये बात समझने में कितनी देर लगी
मिरा वजूद तो बस खेल था किसी के लिए

हलफ़ उठाया था ज़ख़्मों की ला-ज़वाली का
सो कह रहे हैं ग़ज़ल आज तक किसी के लिए

टपक रहा है ज़मीं पर जो ये लहू मेरा
मिरी तरफ़ से है तोहफ़ा तिरी गली के लिए

कभी किसी ने तिरे ग़म नहीं सुने साक़ी
तिरा ये ग़म तो मुनासिब है मय-कशी के लिए

  - Haider Khan

Raqeeb Shayari

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