पूजा हो या इबादत हर काम है मोहब्बत

मंदिर हो या हो मस्जिद पैग़ाम है मोहब्बत

ख़ुद से हो या ज़माँ से या फिर हो दो-जहाँ से
हर जंग जिस ने जीती वो नाम है मोहब्बत

बहते लहू को देखो इन गद्दियों को देखो
करती है सब सियासत बदनाम है मोहब्बत

देखो ज़मीं के हिस्से में आसमाँ नहीं है
सोचो ज़रा कि कितनी नाकाम है मोहब्बत

तेरे बग़ैर गुज़रे तो ज़िंदगी सज़ा है
तू साथ हो अगर तो हर शाम है मोहब्बत

ता'रीफ़ होगी पहले फिर राब्ता बढ़ेगा
हम ने सुना है इस का अंजाम है मोहब्बत

फ़रहाद हो या मजनू हो मीर या हो ग़ालिब
सब कटघरे में आएँ इल्ज़ाम है मोहब्बत

— Haider Khan

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