बिछड़ के तुझ से मेरा दिल फ़क़त सफ़र में रहा
हर एक दिल में लगा यूँ पराए घर में रहा
नज़र से दूर सही आह-ए-बे-असर में रहा
जहाँ कहीं भी गया वो मेरी ख़बर में रहा
नए नए से नज़ारे बहुत मिले लेकिन
तेरी जुदाई का मंज़र मेरी नज़र में रहा
उसी ने जान बचाई थी जिस ने जाँ ली है
तेरी नज़र का वही तीर जो जिगर में रहा
जहाँ कहीं भी वफ़ा का कभी हुआ है ज़िक्र
तेरा ही नाम मेरे अश्क-ए-चश्म-ए-तर में रहा
— Haider Khan















