ख़िज़ाँ का वक़्त है ये मौसम-ए-बहार नहीं
अब आ भी जाओ के इस दिल को अब क़रार नहीं
नज़र मिला के यही बात मुझ सेे फिर से कहो
कि तुमको मेरी मोहब्बत का ए'तिबार नहीं
अभी भी इसके सहारे गुज़ार सकते हैं
ये दिल शिकस्ता तो है पर ये सोगवार नहीं
ज़मीं से वुसअत-ए-आफ़ाक़ तक हमारे सिवा
सभी तुम्हारे याँ तालिब हैं ग़म-गुसार नहीं
चराग़ ले के अभी भी खड़े हो राहों में
और उसके बाद भी कहते हो इंतिज़ार नहीं
ख़ता थी उसकी पर इल्ज़ाम मेरे सर ही रहा
वो शख़्स देखो ज़रा सा भी शर्म-सार नहीं
उसे तो हिज्र के ग़म से भी मिल गई है नजात
वो मेरे दर्जे का शायद गुनाहगार नहीं
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