vo hijr kaat kar chala hai 'ishq men ye aam hai | वो हिज्र काट कर चला है 'इश्क़ में ये आम है

  - Haider Khan

वो हिज्र काट कर चला है 'इश्क़ में ये आम है
यही है 'इश्क़ का सितम ये 'इश्क़ का निज़ाम है

तुम्हें ये इल्म ही नहीं तुम्हारे बाद क्या हुआ
ख़फ़ा ख़फ़ा सी है सुब्ह ख़फ़ा ख़फ़ा सी शाम है

ये 'उम्र बीत जाए अब तेरी गली के मोड़ पर
यही है ख़्वाब अब मेरा यही मेरा मक़ाम है

ये ग़म भुला भी ना सकूँ तुझे बुला भी ना सकूँ
ये मयकदे का क्या करूँ ये मय भी तो हराम है

मैं थक चुका हूँ ज़िंदगी से इस कदर मेरे ख़ुदा
कि लग रहा है अब मेरा ये आख़िरी क़याम है

  - Haider Khan

Gaon Shayari

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