ik kahaanii ke kisi kirdaar men uljha hooñ main | इक कहानी के किसी किरदार में उलझा हूँ मैं

  - Haider Khan

इक कहानी के किसी किरदार में उलझा हूँ मैं
ख़ुद मुझे ही ये नहीं मालूम के क्या क्या हूँ मैं

वो मुझे कह कर गया था फिर मिलेंगे हम यहीं
उसकी खातिर इस शहर में आज भी ठहरा हूँ मैं

भेजता रहता हूँ कुछ गुमनाम ख़त उनके लिए
इस तरह बेचैन उनको रात भर रखता हूँ मैं

मैं बहस करता रहा और वो मुझे तकते रहे
ज़िंदगी में इस तरह भी कुछ बहस हारा हूँ मैं

ये मोहब्बत है या उनको है मुझे खोने का डर
वो मुझे कहते हैं उनको हर जगह दिखता हूँ मैं

वक़्त जब अपना नहीं तो फिर कोई अपना नहीं
ज़िंदगी की इस पढ़ाई में यही समझा हूँ मैं

हूँ किसी को ख़ास तो मैं हूँ किसी को आम सा
देखने वाले की जैसी है नज़र वैसा हूँ मैं

ज़िंदगी में यूँँ फ़साने तो बुनोगे और भी
हाँ मगर जो ना भुला पाओगे वो क़िस्सा हूँ मैं

गर किसी से फेर कर नज़रें मैं आगे बढ़ गया
लाख़ वो आवाज़ दे मुझको नहीं मुड़ता हूँ मैं

  - Haider Khan

Beqarari Shayari

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