ज़िन्दगी यूँं तो बड़ी तेज़ चला करती है
अपनी रफ़्तार से फिर ख़ुद ही डरा करती है
राह रौशन सी नज़र आती हैं सारी मुझको
जब कभी मां मेरे हिस्से में दुआ करती है
जब बिछड़ जाएँगे मां-बाप तो समझोगे तुम
धूप में छत बड़ी क़िस्मत से मिला करती है
दाग़ कैसे हो भला शाह के दामन पर अब
ये सियासत तो गरीबों पे जफ़ा करती है
आंख पे डाल के पट्टी ये कहा राजा ने
मुल्क में आग तो हमको न दिखा करती है
यूँँं तो कहने को यहाँ सबने ज़बाँ रक्खी है
जब ज़बाँ चलनी हो तब इक न चला करती है
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