तुम्हारा मिलने आना फिर गले लग कर बिखर जाना
लगा इस वक़्त के पहिए का इक पल को ठहर जाना
तुम्हारी याद की देहलीज़ पर जब भी मैं आया हूँ
हुआ महसूस इक पल में ही सदियों का गुज़र जाना
अँधेरी रात में भी झील पर बनता तुम्हारा अक्स
कुछ ऐसा था कि जैसे चांद का उस पर उतर जाना
अगर फिर इक दफ़ा तुमने किया ऐसा तो ग़म क्या है
तुम्हारी तो अदा है वादे कर कर के मुकर जाना
अभी कुछ और दिन हम पर मेहरबाँ है ग़मों की रुत
अभी कुछ और दिन लिक्खा है क़िस्मत में निखर जाना
तुम्हारे बाद अब कोई भी इस घर में न आ पाए
इसे तुम जाते जाते आज अपने ग़म से भर जाना
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