रिवाज
अजब रिवाज हैं दुनिया ने जो बनाएँ हैं,
के औरतें तो घरों के लिए बलाएँ हैं।
किसी ने बोझ समझ कर घरों में रक्खा तो,
किसी ने बोल दिया ये तो बद-दुआएँ हैं।
किसी ने ज़ुल्म किया इन पे और फिर बोला,
के औरतें तो फ़कत मर्द की क़बाएँ हैं।
जो मर्द ओढ़ ले जब भी कभी हो जी उस का,
या फिर उतार के पामाल वो करे उनको।
कभी उठा के उन्हें ताज सा रखे सर पर,
कभी अज़ाब सा बद-हाल वो करे उनको।
जो लोग आज है मूरत बने शराफ़त की,
ख़ुद औरतों को निगाहों से तौल देते हैं।
उछालते हैं शहर भर में इज़्ज़तें सबकी,
घरों में लौट के फिर माँ के पाँव छूते हैं।
है औरतों की भी इज़्ज़त ये भूल जाते हैं,
ये उन की शक्ल पे बदना
मियाँ सजाते हैं।
ये जिस की कोख में पाते हैं ज़िन्दगी अपनी,
उसी की ज़ात को सौदे में बेच खाते हैं।
हवस की आग बुझाने के वास्ते ये लोग,
किसी के जिस्म से जब मन हो खेल आते हैं।
ये औरतें ही तो होती हैं हौसलों की मिसाल,
फिर आज क्यूँ हैं ज़माने के सामने ये निढाल।
गली-गली से गुज़रती है सहमी सी औरत,
क़दम-क़दम पे सताता है आबरू का ख़याल।
अगर बचा न सकी आज आबरू अपनी,
तो ये समाज उसी से तो फिर करेगा सवाल।















