सरहद
कभी सरहद पे जब दुश्मन ने अंगारें बिछाईं थीं
हिमालय पर वो जब बारूद की नदियाँ बहाईं थीं
यही था वक़्त जब हम को वतन की इक सदा आई
ख़ुशी से सैकड़ों जाने वतन पर तब लुटाईं थीं
मैं इक घर छोड़ आया था, करोड़ों घर बचाने थे
कई वादे वतन से जो किए थे वो निभाने थे
वफ़ा मेरी कभी सरहद से आ कर पूछ लेना तुम
लहू मेरा वहीं छलका जहाँ गुज़रे ज़माने थे
मेरी वर्दी से तो अब तक वफ़ा की ख़ुशबू आती है
फज़ा ये आज भी क़िस्से शहादत के सुनाती है
सदाएं जब कभी जन गण की उठती हैं यहाँ पर तो
फ़लक ये काँप उठता है, ज़मीं ये थरथराती है
इसी सरहद पे माँओं ने कई बेटे गंवाए थे
इसी सरहद पे भाई से बिछड़ कर बहने रोईं थीं
किसी ने जब जवाँ बेटे का लाशा सामने देखा
न जाने कितने बरसों तक वो आँखें फिर न सोईं थीं
मेरा भी एक क़िस्सा था, मेरी भी इक कहानी थी
वतन के नाम मैं ने भी लिखी अपनी जवानी थी
कई बातें थी दिल में जो कभी मैं कह नहीं पाया
मुझे भी दास्ताँ सारी किसी को तो सुनानी थी
कई लोगों का होगा ज़िक्र मेरे इस फ़साने में
कई लोगों से बिछड़ा हूँ मैं सरहद को बचाने में
मैं घर का इक दिया था जो के रौशन हो रहा था और
किसी झोके ने इक पल भी नहीं सोचा बुझाने में
मेरे दर से कभी बाद-ए-सबा तेरा गुज़र हो तो
मेरी महबूब से कहना उसे मैं याद करता था
मेरी हस्ती मिटे लेकिन उसे इक आँच ना आए
ख़ुदा से हर घड़ी मैं बस यही फरयाद करता था
उसे ये पूछना के क्या सुनाई दे रहा हूँ मैं
उसे क्या अपनी बेटी में दिखाई दे रहा हूँ मैं
उसे कहना के आँखों में नमी अच्छी नहीं लगती
बड़ा मजबूर हो कर ये जुदाई दे रहा हूँ मैं
उसे कहना उसे मैं फिर किसी दिन मिलने आउँगा
सुब्ह की धूप सा चहरे पे उस के झिलमिलाउँगा
मिला हूँ मैं जो इस मिट्टी में तो फिर एक ना इक दिन
कोई पौधा बनूँगा और फिर मैं लहलाहाऊंगा
मेरी मां से ये कह देना के उस के हाथ का ख़ाना
मैं ख़ाना चाहता तो था मगर ये हो नहीं पाया
मुझे इक ख़त मिला था जिस
में मां ने घर बुलाया था
मैं जाना चाहता तो था मगर ये हो नहीं पाया
मेरी मां से ये कहना के दुआ ने रंग लाया है
तेरा बेटा लहू में भीग कर भी मुस्कुराया है
उसे कहना ये वा'दा था उसे मैं मिलने आउँगा
क़फ़न में ही सही मैं ने ये वा'दा भी निभाया है
मेरे बाबास भी पूछो उन्हें क्या गर्व है मुझ पर
वतन की आन की ख़ातिर जो मैं ने जाँ गवाई थी
उन्हें कहना के बेटा आप का वादे का पक्का है
न पीछे वो हटा, गोली सभी सीने पे खाई थी
उन्हें कहना की उन सी शख़्सियत ना है ज़माने में
न ऐसी दौलतें मिलती हैं जन्नत के खज़ाने में
मेरी बहनों से मिलना तो उन्हें पैगाम ये देना
के भाई अब नहीं तो क्या ख़ुदाई तो सलामत है
हुआ क्या जो के दुश्मन ने किया धड़ से अलग सर को
लो बांधों राखियां इस
में कलाई तो सलामत है
जो बहनों के लिए हो पुर-फ़ज़ा वो बन के आऊँगा
हिफाज़त जो करे उन की दुआ वो बन के आऊँगा
कभी सरहद को फिर मेरी ज़रूरत गर पड़ी तो मैं
जो ललकारेगी दुश्मन को सदा वो बन के आऊँगा
मुझे मुर्दा जो कहते हैं उन्हें जा कर ये कह देना
तिरंगे को जो लहराए हवा वो बन के आऊँगा















