तुम

यूँ कभी लगता है मानो तुम हो उन पत्तों के जैसी
जो के पतझड़ में भी शाखों पर खिले रहते हैं हर दम
जो हवाओं के तरानों पर हमेशा झूमते हैं
ज़िंदगी भर आह-ओ-नाला दर्द-ओ-ग़म में वो रहे हैं
हाँ मगर फिर भी मोहब्बत से शजर को चूमते हैं

तुम कभी लगती हो उस महताब की मानिंद मुझ को
मैं जिसे बाम-ए-फ़लक पर मुस्कुराता देखता हूँ
वो के जिस की रौशनी में रात भर मैं भीगता हूँ
पा नहीं सकता उसे मिलता है फिर भी क्यूँ सूकूं सा
जब कभी दरिया में उस का अक्स बनता देखता हूँ

फिर कभी उस रात का इक रूप लगती हो मुझे तुम
जो मेरी दिन भर की सारी ही थकन को चूर कर दे
जब कभी दुनिया के रंज-ओ-ग़म से मैं आजिज़ हो जाऊँ
वो मुझे आग़ोश में ले कर ग़मों को दूर कर दे

तुम कभी उस ख़्वाब के जैसी भी लगती हो मुझे जो
हर सुब्ह चहरे पे इक मुस्कान दे जाता है यूँ ही
ख़्वाब ऐसा के नहीं आसान जिस को भूल पाना
दिल गवारा कर नहीं सकता है जिस का टूट जाना

ख़ूब-सूरत है सभी बातें तुम्हारी और तुम
ख़ूब-सूरत है ये अंदाज़-ए-बयां जो है तुम्हारा
वो तुम्हारा प्यार से कहना के चलते हैं कहीं हम
दूर सहराओं में चल कर काटते हैं ज़िंदगी हम

कौन हो तुम और क्या लगती हो मेरी क्या पता
क्यूँ मैं तुम से आ मिला और क्या है अपना राबता
इन सवालों का ज़ख़ीरा इस जहाँ पर छोड़ दो
जो नहीं है अपने बस में वो ख़ुदा पर छोड़ दो

— Haider Khan

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