मुझे पहले तो लगता था कि ज़ाती मसअला है

मैं फिर समझा मोहब्बत काएनाती मसअला है

परिंदे क़ैद हैं तुम चहचहाहट चाहते हो
तुम्हें तो अच्छा-ख़ासा नफ़सियाती मसअला है

हमें थोड़ा जुनूँ दरकार है थोड़ा सुकूँ भी
हमारी नस्ल में इक जीनियाती मसअला है

बड़ी मुश्किल है बनते सिलसिलों में ये तवक़्क़ुफ़
हमारे राब्तों की बे-सबाती मसअला है

वो कहते हैं कि जो होगा वो आगे जा के होगा
तो ये दुनिया भी कोई तजरबाती मसअला है

हमारा वस्ल भी था इत्तिफ़ाक़ी मसअला था
हमारा हिज्र भी है हादसाती मसअला है

— Umair Najmi

More by Umair Najmi

Other ghazal from the same pen

See all from Umair Najmi →

Visaal Shayari

Shers of visaal.

All Visaal Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling