जहाँ से तुम गुज़रती हो कई शाखें झुकी होंगी
किसी जख़्मी परिन्दे की वहीं सासें थमी होंगी
छुपा होगा कोई आशिक़ तुम्हारा उन हवाओं में
कई फूलों में पत्तों में कई बातें छुपी होंगी
गुज़र कर भी गुज़र जाना नहीं होता है आँखों से
पलक भर के अँधेरो में कई रातें रुकी होंगी
तुम्हारे बाद भी बातें तुम्हारी ही बहेंगी अब
खनक आवाज़ की आबो हवा में आशिक़ी होंगी
ये शबनम हैं हमारे चाँद के गिरते हुए आँसू
किसी तिनकें के होंठों पर तेरी यादें ढली होंगी
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