जिस को पा के लगी ज़िन्दगी ज़िन्दगी
खो के उसको मिलेगी कभी क्या ख़ुशी
तुम को देखूँ कि बस देखता ही रहूँ
देख कर के तुम्हे जैसे दुनिया मिली
तुम से भी झूठ कहना पड़ा भीड़ में
अब नहीं याद आती किसी की कभी
जीस्त में जिसके अपना नहीं कुछ रहा
बस उसी की हमें याद आती रही
तोड़ दो बेड़ियाँ गर ज़रूरी न हो
बोझ दिल पे रहे है ये कितना सही
लिख रहा तेरे होठों पे कोरी ग़ज़ल
तू हर इक शय में ही याद आती रही
हुस्न पे सादगी का है अपना असर
ले के डूबी है कितनों को ये सादगी
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