एक लड़की मुझ को ज़ख़्मी लग रही है
उस के हाथों में जो मेहँदी लग रही है
इक मुझे ही देखने के वास्ते अब
उस के घर में एक खिड़की लग रही है
मैं जो सहमा-सहमा बैठा हूँ यहाँ पर
ये मोहब्बत अब बला सी लग रही है
चोट दिल पर मैं ने खाई है ज़ियादा
और बदन पर मेरे हल्दी लग रही है
उस ने मेरा साथ छोड़ा क्यूँ बताओ
मुझ को इस
में रब की मर्ज़ी लग रही है
रब ने किस अंदाज़ से उस को बनाया
मुझ को वो बोतल तो रम की लग रही है
देखी थी जितनी जवानी में दिल-ए-जाँ
ख़ूब-सूरत अब भी उतनी लग रही है
— Vaseem 'Haidar'















