ये ग़लतफ़हमी है तुम्हारी दिल
अब कि वो लड़की भी है हारी दिल
एक ही छत के नीचे रहते हैं
वहशी आँखें मिरा पुजारी दिल
मेरी तन्हाई के हैं दो साथी
इक मैं हूँ एक मेरा भारी दिल
ये मुझे ही पता है के कैसे
तेरे बिन ज़िन्दगी गुज़ारी दिल
इक ज़माना था इश्क़ का, जब लोग
बात पर मरते थे तुम्हारी दिल
तुझ को इक दिन बहुत रुलाएगा
तेरा ये ज़ूद ए'तिबारी दिल
खूब करते रहो ख़ता 'कातिब'
ग़लतियाँ गिन रहा है सारी दिल
— Ved prakash Pandey















