Ved prakash Pandey

Ved prakash Pandey

@vedpr651310

Ved prakash Pandey shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ved prakash Pandey's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

है इश्क़ पर पहरे हमारे इस तरह की क्या कहें वो पानी पीने के बहाने फ़ोन करती है मुझे — Ved prakash Pandey
दिल नहीं लग रहा है मेरा कही तुम अभी भी ख़फ़ा हो क्या मुझ सेे — Ved prakash Pandey
अब तो पानी भी भर गया हर सू क्यूँ ये जलता हुआ मकाँ न बुझा — Ved prakash Pandey
कैसे छिपाए हाल-ए-दिल हर दर्द दिखाई देता है कमरा बंद रहे अंदर का शोर सुनाई देता है — Ved prakash Pandey
मेरी सारी ग़ज़लें तुम बिन खारिज़ हैं क्या तुम को इस का थोड़ा भी इल्म न था — Ved prakash Pandey

Ghazal

वक़्त ने जब रख दिया जज़्बों को अंदर तोड़ कर इक परिंदा कर दिया आज़ाद तब पर तोड़ कर कुछ भी तो अच्छा नहीं बन पाया मेरीे ख़ाक से मुझ को कूज़ा-गर ने देखा है बना कर तोड़ कर मैं किसी और का न हो पाया कभी फिर उम्र भर इश्क़ ने जब रख दिया अंदर से बाहर तोड़ कर मुफलिसी जब हद से ज़्यादा बढ़ गई तो मैं अदीब आ गया फिर ख़ुद से बाहर दिल को अंदर तोड़ कर जब कोई आतिश फ़िशाँ मिल जाए तब ये पूछना किस तरह रक्खा है ये दुख तुम ने भीतर तोड़ कर ज़िन्दगी मुझ को तिरे होने पे लानत हो बहुत जीता हूँ माँ-बाप के मैं ख़्वाब को गर तोड़ कर बात केवल इक भरोसे की थी वरना मेरे दोस्त किस को अच्छा लगता है ख़ुद अपना ही घर तोड़ कर मैं तुम्हारे जिस्म में उस इक जगह पर क़ैद हूँ तुम जहाँ रखती हो ख़ुद के ख़्वाब अक्सर तोड़ कर — Ved prakash Pandey
तुम को खो कर के ख़ुश नहीं हैं हम दूर हो कर के ख़ुश नहीं हैं हम दर्द कम होता है रो लेने से गर फिर क्यूँ रो कर के ख़ुश नहीं हैं हम ऐसे कुछ काम भी थे ज़िन्दगी में यार जो कर के ख़ुश नहीं हैं हम इश्क़ ऐसा गुनाह है जिस का पाप धो कर के ख़ुश नहीं हैं हम क्यूँ झिझक हो हमें ये कहने में तेरे होकर के ख़ुश नहीं हैं हम हाए इक मुस्कुराते चेहरे में ग़म पिरो कर के ख़ुश नहीं हैं हम तेरे दरिया-ए-इश्क़ में अपना दिल डुबो कर के ख़ुश नहीं हैं हम यार तेरे बिना जवानी का बोझ ढो कर के ख़ुश नहीं हैं हम इक ख़ुशी के गुबारे में अपना ग़म चुभो कर के ख़ुश नहीं हैं हम जान-ए-जाँ अब फ़िराक़ में तेरी शब भिगो कर के ख़ुश नहीं हैं हम किस सेे शिकवा करें कि क्यूँ ख़ुद को इक से दो कर के ख़ुश नहीं हैं हम माँग में तेरी अपने सपनों का खू़ँ सँजो कर के ख़ुश नहीं है हम डूबने वाले जानते ही नहीं लाश ढो कर के ख़ुश नहीं हैं हम दुनिया वालों तुम्हारी दुनिया में साँसे ढो कर के ख़ुश नहीं हैं हम इस मुहब्बत के दश्त में "कातिब" ज़हर बो कर के ख़ुश नहीं हैं हम — Ved prakash Pandey
ज़ेहन दिल ज़बान उस का ही ग़ुलाम अब भी है या'नी मेरे रूह में वो एक नाम अब भी है इब्तिदा-ए-इश्क़ में जो ढूँढ़ती थी बस मुझे उस नज़र का याद आखरी सलाम अब भी है मैं तुम्हें अभी ये रौशनी न दे सकूँगा दोस्त मेरे जिस्म से लिपट के बैठी शाम अब भी है मेरे जैसों को चुनो तो ये पता चले तुम्हें शहर में बचा हुआ वफ़ा का नाम अब भी है एक शख़्स से हुए हैं बरसों बिछड़े फिर भी यार उस के ही लिए धड़कना दिल का काम अब भी है तेरे सजदे करने वाले एक लड़के के लिए इश्क़ विश्क़ और किसी से भी हराम अब भी है बस उस एक लड़की का ख़याल आता है मुझे जिस के वास्ते ज़रूरी ये निज़ाम अब भी है — Ved prakash Pandey
ऐ दिल-ए- नादान अब तो तू धड़कना छोड़ दे उस ने रो कर कह दिया है मेरा रस्ता छोड़ दे मैं ने उस लड़की से बस इतना ही चाहा था कि वो साथ मेरे जब रहे तो हाथ ग़म का छोड़ दे तुझ सेे तो इक फूल तक तोड़ा न जाता इस लिए इश्क़ का कहता हूँ कारोबार करना छोड़ दे सारी बातें यूँँ तो मैसेज में मुनासिब भी नहीं फ़ोन पर कहने को कुछ बातें भी यारा छोड़ दे ऐसी ज़ुल्मत में तो सब को जलना होता है मगर क्या हो गर डर से दिया भी साँस लेना छोड़ दे फिर कहाँ मिल पाते ये जो इश्क़ करने वाले हैं सोचने लगता ख़ुदा गर कुन कहे या छोड़ दे हर दफ़ा रोना भी जाइज़ बात कह पाता नहीं अश्क वो होता है जो दामन पे धब्बा छोड़ दे — Ved prakash Pandey
धोखा फ़रेब और दगा लिखने लगा हूँ मैं इस दिल के साथ जो हुआ लिखने लगा हूँ मैं उस की हवेली इश्क़ की जिस कूचे में बनी उस दिल गली का रास्ता लिखने लगा हूँ मैं अच्छे भले इंसान को जीते जी मार दे है इश्क़ वैसा हादसा लिखने लगा हूँ मैं उन नज़रों के गिरफ़्त में जब से मैं आया हूँ कुछ ऐन शीन काफ़ सा लिखने लगा हूँ मैं इस इक भरम में बरसो रहा दिल मेरा के वो बस मेरा है जिसे ख़ुदा लिखने लगा हूँ मैं ख़ुद के क़रीब देखना फिर देखना जुदा है मसअला ख़याल का लिखने लगा हूँ मैं इस रोग का इलाज तो मुमकिन नहीं है दोस्त सो मशवरा है हिज़्र का लिखने लगा हूँ मैं इक शख़्स मेरे दिल से जरा दूर क्या हुआ हर चेहरे को ही बे-वफ़ा लिखने लगा हूँ मैं — Ved prakash Pandey
सूनी गलियाँ सूना आँगन सूने दर को छोड़ कर ऐसे जाता है भला क्या कोई घर को छोड़ कर कुछ भी अब अपना नहीं रखना है मुझ को ज़ेहन में उस ख़ुदा की इक मुहब्बत के असर को छोड़ कर पत्ता-पत्ता डाली-डाली को उदासी दे के आज इक परिंदा उड़ गया है फिर शजर को छोड़ कर इश्क़ का पैग़ाम लाने वाले पक्षी आज भी सबके घर पर आते हैं बस मेरे घर को छोड़ कर चूम कर जब नाफ़ तक जाने लगा तो कहने लगी यूँँ न जाते बीच में ऐसे सफ़र को छोड़ कर जिस को देखें रेगज़ारों में तो बुझ जाती है प्यास चल दिए हम बस अना में उस नज़र को छोड़कर मुझ को मीलों तक अँधेरे में अभी भी जाना है गर तुम्हें जाना हो तो जाओ सफ़र को छोड़ कर सारे के सारे परिंदे हाए! हिजरत कर गए उम्र उतरी एक दिन जब इक शजर को छोड़ कर — Ved prakash Pandey
इश्क़ का फ़ैसला ग़लत हुआ तो रात भर जागना ग़लत हुआ तो दिल कहाँ इतना सोच पाता है आँख में डूबना ग़लत हुआ तो कई मासूम जाँ से जाऍंगे तेरा कुछ भी कहा ग़लत हुआ तो वो बिछड़ कर के मुझ सेे ख़ुश होगा मेरा ये सोचना ग़लत हुआ तो इश्क़ लाइक़ नहीं भरोसे के बा'द में रास्ता ग़लत हुआ तो भरी आँखों से पूछा था किसी ने लखनऊ छोड़ना ग़लत हुआ तो उस को कर तो दूँ बे-नक़ाब मगर यार ग़ुस्सा मिरा ग़लत हुआ तो हिज़्र के नागवार मौसम में खिड़कियाँ खोलना ग़लत हुआ तो ढूँढ़ने चल दिया तो है ख़ुद को तेरा ये भी पता ग़लत हुआ तो मेरे अग़्लात सामने रक्खो बा'द में टोकना ग़लत हुआ तो — Ved prakash Pandey
शहर में जब भी धूल उड़ती है बेबसी की ही धूल उड़ती है साँस लेना भी भारी है अब तो मौत की ऐसी धूल उड़ती है अश्कों की बूँदा बाँदी से पहले तेरी यादों की धूल उड़ती है और कुछ भी नज़र नहीं आता इश्क़ में इतनी धूल उड़ती है आजकल मेरे दिल मुहल्ले में मीर ग़ालिब की धूल उड़ती है ताकते रह गए हम इक फ़्रेम आईने से भी धूल उड़ती है मेरे होंठो से सच निकलता है सबके चेहरे की धूल उड़ती है जब भी तेरा ख़याल आता है दिल में हल्की सी धूल उड़ती है बीते लम्हों की तू सबा मत भेज सूखे फूलों की धूल उड़ती है अपनी आँखें ही बंद रखता हूँ शहर में इतनी धूल उड़ती है मौत आने की है यही पहचान जिस्म से जाँ की धूल उड़ती है याद "कातिब" को जब वो करती हैं चेहरे से ग़म की धूल उड़ती है — Ved prakash Pandey
बात मुझ सेे नहीं बनी समझो वो हुई ही नहीं मिरी समझो इस तरह से न चाहो दुनिया को मौत के बा'द ज़िन्दगी समझो पढ़ने के वक़्त आशिक़ी करना इस को इक बेवक़ूफ़ी ही समझो तुम किसानों की ख़ुद-कुशी से दोस्त कितनी मुश्किल है ये घड़ी समझो माल ओ ज़र प्यार क्या ख़रीदेंगे हम अमीरों की मुफ़लिसी समझो पहले हर लफ़्ज़ से रहो वाकिफ़ तब कहीं जा के शा'इरी समझो हम अगर रो न पा रहे हैं तो दरिया में पानी की कमी समझो शोर सब को सुनाई देता है बात तब है जो ख़ामुशी समझो हम बहुत थक चुके हैं ज़िन्दगी से तुम ये अश'आर आख़िरी समझो जब तलक साथ चल रही हो मिरे ग़ौर फ़रमाओ बात ही समझो इतने नज़दीक भी नहीं तुम, जो पल दो पल की मेरी ख़ुशी समझो आख़िर इस दिल ख़राबे में 'कातिब एक लड़की क्यूँ आएगी समझो — Ved prakash Pandey
ये चराग़ों की ही जसारत थी वरना बुझ जाते ऐसी हालत थी मेरे अंदर जो मर गया है ना उस को तुम सेे बहुत मुहब्बत थी आप क्यूँ हम पे मर गए जब के आप को जीने की सहूलत थी कर लिया ऐतिबार जो भी मिला दिल लगाने की इतनी उजलत थी आपसे जिस्म किस ने माँगा था हम को बस प्यार की ज़रूरत थी उस के धोके से पहले दिल में मेरे प्यार देने की इक रिवायत थी उस गली से गुज़रना ही यारों दिल की सब सेे बड़ी हिमाकत थी तुम क्यूँ रोते हो इश्क़ के लिए अब तुम को तो जिस्म की ज़रूरत थी हो गए मूव ऑन सो उन सेे दोस्ती थी न अब अदावत थी मुंतज़िर सिर्फ़ तुम नहीं थे कल शहर भर में हमारी दावत थी इस लिए रिश्ते नाते छूट गए हम को सच बोलने की आदत थी हम को कम-अक़्ल ही रखा तुम ने उम्र तुम सेे यही शिकायत थी बेवफाई ने जाँ ले ली वरना प्यार करना तो उस की आदत थी मेरी सुनता न था कोई "कातिब" शहर में आज ऐसी वहशत थी — Ved prakash Pandey