वक़्त ने जब रख दिया जज़्बों को अंदर तोड़ कर
इक परिंदा कर दिया आज़ाद तब पर तोड़ कर
कुछ भी तो अच्छा नहीं बन पाया मेरीे ख़ाक से
मुझ को कूज़ा-गर ने देखा है बना कर तोड़ कर
मैं किसी और का न हो पाया कभी फिर उम्र भर
इश्क़ ने जब रख दिया अंदर से बाहर तोड़ कर
मुफलिसी जब हद से ज़्यादा बढ़ गई तो मैं अदीब
आ गया फिर ख़ुद से बाहर दिल को अंदर तोड़ कर
जब कोई आतिश फ़िशाँ मिल जाए तब ये पूछना
किस तरह रक्खा है ये दुख तुम ने भीतर तोड़ कर
ज़िन्दगी मुझ को तिरे होने पे लानत हो बहुत
जीता हूँ माँ-बाप के मैं ख़्वाब को गर तोड़ कर
बात केवल इक भरोसे की थी वरना मेरे दोस्त
किस को अच्छा लगता है ख़ुद अपना ही घर तोड़ कर
मैं तुम्हारे जिस्म में उस इक जगह पर क़ैद हूँ
तुम जहाँ रखती हो ख़ुद के ख़्वाब अक्सर तोड़ कर















