धोखा फ़रेब और दगा लिखने लगा हूँ मैं

इस दिल के साथ जो हुआ लिखने लगा हूँ मैं

उस की हवेली इश्क़ की जिस कूचे में बनी
उस दिल गली का रास्ता लिखने लगा हूँ मैं

अच्छे भले इंसान को जीते जी मार दे
है इश्क़ वैसा हादसा लिखने लगा हूँ मैं

उन नज़रों के गिरफ़्त में जब से मैं आया हूँ
कुछ ऐन शीन काफ़ सा लिखने लगा हूँ मैं

इस इक भरम में बरसो रहा दिल मेरा के वो
बस मेरा है जिसे ख़ुदा लिखने लगा हूँ मैं

ख़ुद के क़रीब देखना फिर देखना जुदा
है मसअला ख़याल का लिखने लगा हूँ मैं

इस रोग का इलाज तो मुमकिन नहीं है दोस्त
सो मशवरा है हिज़्र का लिखने लगा हूँ मैं

इक शख़्स मेरे दिल से जरा दूर क्या हुआ
हर चेहरे को ही बे-वफ़ा लिखने लगा हूँ मैं

— Ved prakash Pandey

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