तू तो ऐसे पुकारता है मुझे

जैसे बरसो से जानता है मुझे

मैं बुरे वक़्त की तरह ही हूँ
देर तक कौन सोचता है मुझे

क्या मुहब्बत मज़ाक है मेरी
जो तू हर रोज़ टालता है मुझे

मुफ़लिसी दर पे बैठी है मेरी
वक़्त हर रोज़ टोकता है मुझे

उस पे मैं तीर खींच कर खड़ा हूँ
और वो राम मानता है मुझे

रात के तीसरे पहर में जब
दिल का सौदा हुआ पता है मुझे

ग़म ने पूछा पकड़ के हाथ इक दिन
क्यूँ तू हर रोज़ ढूंढता है मुझे

तुम को जो एक दुनिया हासिल है
यार वो भी नहीं अता है मुझे

— Ved prakash Pandey

More by Ved prakash Pandey

Other ghazal from the same pen

See all from Ved prakash Pandey →

Mohabbat Shayari Collection

Shers of mohabbat shayari collection.

All Mohabbat Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling