ज़ेहन दिल ज़बान उस का ही ग़ुलाम अब भी है
या'नी मेरे रूह में वो एक नाम अब भी है
इब्तिदा-ए-इश्क़ में जो ढूँढ़ती थी बस मुझे
उस नज़र का याद आखरी सलाम अब भी है
मैं तुम्हें अभी ये रौशनी न दे सकूँगा दोस्त
मेरे जिस्म से लिपट के बैठी शाम अब भी है
मेरे जैसों को चुनो तो ये पता चले तुम्हें
शहर में बचा हुआ वफ़ा का नाम अब भी है
एक शख़्स से हुए हैं बरसों बिछड़े फिर भी यार
उस के ही लिए धड़कना दिल का काम अब भी है
तेरे सजदे करने वाले एक लड़के के लिए
इश्क़ विश्क़ और किसी से भी हराम अब भी है
बस उस एक लड़की का ख़याल आता है मुझे
जिस के वास्ते ज़रूरी ये निज़ाम अब भी है
— Ved prakash Pandey















