ये चराग़ों की ही जसारत थी

वरना बुझ जाते ऐसी हालत थी

मेरे अंदर जो मर गया है ना
उस को तुम से बहुत मुहब्बत थी

आप क्यूँ हम पे मर गए जब के
आप को जीने की सहूलत थी

कर लिया ऐतिबार जो भी मिला
दिल लगाने की इतनी उजलत थी

आपसे जिस्म किस ने माँगा था
हम को बस प्यार की ज़रूरत थी

उस के धोके से पहले दिल में मेरे
प्यार देने की इक रिवायत थी

उस गली से गुज़रना ही यारों
दिल की सब से बड़ी हिमाकत थी

तुम क्यूँ रोते हो इश्क़ के लिए अब
तुम को तो जिस्म की ज़रूरत थी

हो गए मूव ऑन सो उन से
दोस्ती थी न अब अदावत थी

मुंतज़िर सिर्फ़ तुम नहीं थे कल
शहर भर में हमारी दावत थी

इस लिए रिश्ते नाते छूट गए
हम को सच बोलने की आदत थी

हम को कम-अक़्ल ही रखा तुम ने
उम्र तुम से यही शिकायत थी

बेवफाई ने जाँ ले ली वरना
प्यार करना तो उस की आदत थी

मेरी सुनता न था कोई "कातिब"
शहर में आज ऐसी वहशत थी

— Ved prakash Pandey

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