ऐ दिल-ए- नादान अब तो तू धड़कना छोड़ दे

उस ने रो कर कह दिया है मेरा रस्ता छोड़ दे

मैं ने उस लड़की से बस इतना ही चाहा था कि वो
साथ मेरे जब रहे तो हाथ ग़म का छोड़ दे

तुझ से तो इक फूल तक तोड़ा न जाता इस लिए
इश्क़ का कहता हूँ कारोबार करना छोड़ दे

सारी बातें यूँ तो मैसेज में मुनासिब भी नहीं
फ़ोन पर कहने को कुछ बातें भी यारा छोड़ दे

ऐसी ज़ुल्मत में तो सब को जलना होता है मगर
क्या हो गर डर से दिया भी साँस लेना छोड़ दे

फिर कहाँ मिल पाते ये जो इश्क़ करने वाले हैं
सोचने लगता ख़ुदा गर कुन कहे या छोड़ दे

हर दफ़ा रोना भी जाइज़ बात कह पाता नहीं
अश्क वो होता है जो दामन पे धब्बा छोड़ दे

— Ved prakash Pandey

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Gulshan Shayari

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