दस्त हक़ में मिरे उठा दो बस
मुझ को पैसे नहीं दुआ दो बस
उस की तस्वीर को बनाते वक़्त
मुझ को तस्वीर से हटा दो बस
मूड मेरा बहुत ख़राब है दोस्त
कोई अच्छी ग़ज़ल सुना दो बस
मैं किसी और का न हो पाया
कोई जा कर उसे बता दो बस
कल जो लड़की मिली थी साड़ी में
मुझ को उस का कोई पता दो बस
इश्क़ उकता गया है दर्शन से
तुम बदन का मुझे पता दो बस
आख़िरी चीज़ भी करो 'कातिब'
उठ के सूरज को अब बुझा दो बस
— Ved prakash Pandey















