बात मुझ सेे नहीं बनी समझो

वो हुई ही नहीं मिरी समझो

इस तरह से न चाहो दुनिया को
मौत के बा'द ज़िन्दगी समझो

पढ़ने के वक़्त आशिक़ी करना
इस को इक बेवक़ूफ़ी ही समझो

तुम किसानों की ख़ुद-कुशी से दोस्त
कितनी मुश्किल है ये घड़ी समझो

माल ओ ज़र प्यार क्या ख़रीदेंगे
हम अमीरों की मुफ़लिसी समझो

पहले हर लफ़्ज़ से रहो वाकिफ़
तब कहीं जा के शा'इरी समझो

हम अगर रो न पा रहे हैं तो
दरिया में पानी की कमी समझो

शोर सब को सुनाई देता है
बात तब है जो ख़ामुशी समझो

हम बहुत थक चुके हैं ज़िन्दगी से
तुम ये अश'आर आख़िरी समझो

जब तलक साथ चल रही हो मिरे
ग़ौर फ़रमाओ बात ही समझो

इतने नज़दीक भी नहीं तुम, जो
पल दो पल की मेरी ख़ुशी समझो

आख़िर इस दिल ख़राबे में 'कातिब
एक लड़की क्यूँ आएगी समझो

— Ved prakash Pandey

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