मेरे दिल का इशारा समझा कर
हो चुका हूँ तुम्हारा समझा कर
जीतने वाले बढ़ते रहते है
रुकने वालों को हारा समझा कर
बिन मआ'नी तो कुछ नहीं इस
में
लफ्ज़ को बे-सहारा समझा कर
यार ग़म में किसी तरह से मैं
कर रहा हूँ गुज़ारा समझा कर
गर समुंदर में जीना है 'कातिब'
तू भँवर को किनारा समझा कर
— Ved prakash Pandey















